समग्रतृप्ति यानी मोक्ष का संबन्ध ‘विकास’ से है, भौतिक साधनों या जाति-वर्ण-कुल से नहीं। कबीर बेहद /कैलाश बौद्ध मोस्ट युवा जागृति संस्थान

_”समग्रतृप्ति यानी मोक्ष का संबन्ध ‘विकास’ से है, भौतिक साधनों या जाति-वर्ण-कुल से नहीं। कबीर बेहद गरीब थे, खाने के लाले तक पड़ जाते थे। रैदास भी भौतिक रूप से विपन्न थे। बुद्ध-महावीर अति अमीर थे, लेकिन मंज़िल अमीरी से नहीं मिली। वे जब शिखर पाए, उनके पास कुछ-भी न था। मीरा रानी थी, रानित्व ने जीवन का मुकाम नहीं दिया। शुरुवाती बात करें तो पार्वती राजकुमारी थी, शिवत्व अर्जित की तो ऐसे वैभव से शून्य थी। जो लोग कहते हैं– संसाधन नहीं, हालात अनुकूल नहीं, रोटी-रिश्ते की फिक्र पहले जरूरी है!– वे लोग खुद को धोखा देने वाले अपाहिज़-बुजदिल-कायर यानी ‘आत्मघाती ‘ हैं।”_

_चैतन्य~ दृष्टि :_
*🎇भारतीय संतों के आकाश में ध्रुवतारा हैं रैदास!*

_रैदास कबीर के गुरूभाई हैं। भारत का आकाश संतों के सितारों से भरा है। यद्यपि ज्‍योति सबकी एक है तथापि संत रैदास उन सब सितारों में ध्रुवतारा हैं। इसलिए कि शूद्र (चमार) के घर में पैदा होकर भी काशी के पंडितों को हरा दिया। महावीर का उल्‍लेख नहीं किया ब्राह्मणों ने अपने शास्‍त्रों में। बुद्ध की जड़ें काट डाली, उनके विचार को उखाड़ फेंका। लेकिन रैदास में कुछ बात है। रैदास को नहीं उखाड़ सके। रैदास को स्‍वीकार भी करना पडा।_

ब्राह्मणों के द्वारा लिखी गई संतों की स्‍मृतियों में रैदास सदा स्‍मरण किए गए। चमार के घर में पैदा होकर भी ब्राह्मणों ने स्‍वीकार किया—वह भी काशी के ब्राह्मणों ने : रैदास की बात कुछ अनेरी है, वे अनूठे हैं।
_रैदास में कुछ रस है, कुछ सुगंध है—जो मदहोश कर दे। रैदास से बहती है कोई शराब, कि जिसने पी वही डोला। रैदास अड्डा जमा कर बैठ काशी में,जहां की सबसे कम संभावना है; जहां का पंडित पाषाण हो चुका है।_
सदियों का पांडित्‍य व्‍यक्‍तियों के ह्रदयों को मार डालता है। उनकी आत्‍मा को जड़ कर देता है। रैदास वहां खिले, फूले।
_छोटे-मोटे भक्‍त नहीं, राजपूतानी “मीरा जैसी अनुभूति” को उपलब्‍ध महिला ने भी रैदास को गुरू माना।_
मीरा ने कहा है: गुरु मिल्‍या रैदास जी, कि मुझे गुरु मिल गया है रैदास जी। भटकती फिरती थी: बहुतों में तलाशा था, लेकिन रैदास को देखा कि झुक गई।
_चमार के सामने राज रानी झुके तो बात कुछ रही होगी। वह कमल कुछ अनूठा रहा होगा, बिना झुके न रहा जा सका होगा।_

रैदास और कबीर दोनों एक ही संत के शिष्‍य है। रामा नंद गंगोत्री है जिनसे कबीर और रैदास की धाराएं बही है। रैदास के गुरु है रामा नंद जैसे अद्भुत व्‍यक्‍ति: और रैदास की शिष्‍या है मीरा अद्भुत नारी। इन दोनों के बीच में रैदास की चमक अनूठी है।
_रामा नंद को लोग भूल ही गए होते अगर रैदास और कबीर न होते। रैदास का अगर एक भी वचन न बचता और सिर्फ मीरा का यह कथन बचता: गुरु मिल्‍या रैदास जी, तो काफी था। क्‍योंकि जिसको मीरा गुरु कहे, वह कुछ ऐसे-वैसे को गुरु न कह देगी। कबीर को भी मीरा ने गुरु नहीं कहा है। जूते-चप्पल की मरम्मत करने वाले रैदास को गुरु कहा।_

कैलाश बौद्ध

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