नई दिल्‍ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने आखिरकार सोमवार देर रात

नई दिल्‍ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने आखिरकार सोमवार देर रात अमेरिकी राष्ट्रपति शपथ ग्रहण समारोह के बाद पहली टेलीफोनिक बातचीत की. इस संबंध में दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों की ओर से जारी किए गए बयान उन विषयों को इंगित करते हैं, जिन पर बात हुई है. दोनों बयानों में दो बहुत महत्वपूर्ण मुद्दों का जिक्र है जो वार्ता में प्रमुखता से सामने आए हैं. इनमें जलवायु परिवर्तन और स्वतंत्र व मुक्‍त हिंद प्रशांत क्षेत्र हैं.

जलवायु परिवर्तन बाइडेन प्रशासन के लिए काफी महत्‍वपूर्ण विषय है. इस मुद्दे के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति बाइडेन ने नया विशेष जलवायु राजदूत (Special Climate Envoy) नियुक्त किया है, यह पूर्व विदेश मंत्री जॉन केरी हैं. पेरिस जलवायु समझौते से फिर से जुड़ना भी नए राष्ट्रपति की ओर से लिए गए पहले अहम निर्णयों में से एक था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार भारत के लिए जलवायु परिवर्तन के महत्व के बारे में बात कर चुके हैं. उनकी सरकार ने 2030 तक 100 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा के लिए एक बड़ा लक्ष्‍य रखा है. भारत उन कुछ विकासशील देशों में से एक है जो जलवायु परिवर्तन को कम करने में अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है. मोदी सरकार जॉन केरी के साथ बातचीत के लिए विशेष जलवायु दूत की नियुक्ति करने में बेहतर प्रयास करेगी. जैसा कि चीन ने किया है.

चीन अपने अनुभवी जलवायु वार्ताकार झी झेनहुआ को वापस लाया है, जिनके पास जॉन केरी के साथ चीनी सरकार के जलवायु दूत के रूप में बातचीत करने का ट्रैक रिकॉर्ड है. भारत को भी इसी तरह की तर्ज पर सोचना चाहिए.

बयान में दर्ज अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों में स्वतंत्र और खुला भारत प्रशांत क्षेत्र है. यह भारत और जापान, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे पारंपरिक अमेरिकी सहयोगियों के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिनमें से सभी को हाल के क्षेत्रीय विवादों में चीन द्वारा गलत तरीके से देखा गया है.

भारत उम्मीद कर रहा है कि नया बाइडेन प्रशासन वास्‍तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर गतिरोध कम करने के लिए चीन पर दबाव बनाएगा. लेकिन अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन के बयानों से यह स्पष्ट है कि ट्रंप का दृष्टिकोण भले ही सिद्धांत रूप में सही रहा हो, लेकिन वह तरीका गलत था. ट्रंप को इसके लिए धन्यवाद, अब भविष्य में कोई भी अमेरिकी प्रशासन सामान्य तरीके से चीन के साथ सौदा करने को तैयार नहीं होगा. यह स्पष्ट है कि 21वीं सदी में अमेरिका-चीन संबंध 20वीं सदी के बहुत से अमेरिकी-सोवियत संघ के रिश्ते के समान होने जा रहा है. कई विदेश नीति टिप्पणीकार जैसे गिदोन राचमन इसे नया शीत युद्ध कह रहे हैं. (यह अंग्रेजी की खबर का अनुवाद है. इस पूरी खबर को पढ़ने के लिए यहां Click करें.)

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