gram Panchayat chunav-कौन सीट आयी गांव मा-कलुआ चमार रामशुर यादव और चिन्तु पंडित जी का प्रधानी लड़खये। तीनों जने श्री खवा खवा के अघा गे है। जागेश्वर नउआ का मन तौ है पर वा स्वाचत

*कौन सीट आयी गांव मा*
कलुआ चमार रामशुर यादव और चिन्तु पंडित जी का प्रधानी लड़खये। तीनों जने श्री खवा खवा के अघा गे है। जागेश्वर नउआ का मन तौ है पर वा स्वाचत है कि सीट क्लियर हुई जाए तौ महू श्री खवाब चालू करो। गांव के युवा प्रत्यासी रोज दारू के पार्टी दयी रहे हैं। पर मन मा टेंशन ही कि कौन सीट आयी। हर गांव मा दर्जन भर प्रत्यासी है। पर सन्नाटा ऐसे पसरा है कि मानो प्रधानी का चुनाव ही नहीं है। गांव के नन्ना कहत हे कि ससु कबै सीट क्लियर हुई तौ फ्री के श्री और राज श्री मिली। जितय के बाद तौ सार दिखात निहाय कम से कम पहिलेहे खा लीन जाए। एक गांव मा प्रधान प्रत्याशी बुढ़वन का चारो धाम करवाने लेइगा है। तौ कनो गांव मा प्रत्यासी पाव परब चालू कर दीन है। इन सब के बीच जनता की चांदी है। जो कोई पूछता है कि मैं प्रधानी लड़ जाउका, तुरतै चार जने कहत हे की ठाड़ हुई जा हम तोये साथ हाइन। जनता फूल मजा ले रही है। पर इन सब के बीच हमेशा की तरह गांव के मुद्दे गायब हैं। फिर वही ब्राह्मण, यादव लोधी चमार की गिनती जारी है। ग्रामीण राजनीति में हमेशा जातिवाद हावी रहा है। फला जाती वाले फला जाती वालों का प्रधान नहीं बनने देंगे। तीन लोग सिर्फ फलाने को हराने के लिए खड़े होंगे। कोई किसी की दारू पियेगा कोई गुटखा खायेगा। व्यक्तिगत खुन्नस भी निकाली जाएगी। मार धाड़ भी होगी। सब कुछ होगा पर असल मुद्दे पर बात नहीं होगी। सीट चाहे जो आए, प्रधान तो आपके गांव का व्यक्ति ही बनेगा। आप प्रत्याशियों में जाति देखना कब बंद करेंगे। कितने प्रधान बने जिसने जीतने के बाद अपनी जाति का भला किया हो। जब वह जीतने के बाद सब भूल जाता है तो आप क्यो जाति देख रहे हैं। क्यो नहीं सब प्रत्याशियों को खड़ा करके उनसे पुछ्ते कि बताईये आप गांव का विकास कैसे करेंगे? अन्ना जानवर, कालोनियों में भ्रष्टाचार, राशन वितरण को सही ढंग से कैसे चलाएंगे। सड़के नाली कैसे बनवाएंगे। गाँव को नशा मुक्त कैसे करेंगे। गांव में सिचाई की समस्या, बेरोजगारी कैसे दूर करेंगे। जिस दिन आप ने श्री और दारू को ठुकरा कर वोट मांगने वाले से यह सवाल पूछना चालू कर दिया। उस दिन गांव की दशा और दिशा बदल जाएगी। व्यक्तिगत विचारों को छोड़िए और गांव के बारे में सोचिए। यह सिर्फ प्रधानी का चुनाव नहीं है। यह गांव के प्रधान सेवक को चुनने का चुनाव है। जो गांव की समस्याओं को अपनी समस्या समझे उसे चुनिए, सीटे तो आती जाती रहेंगी।

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